Saturday, 29 December 2012

रंजिश ही सही

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ।
          अब तक दिल-ए-ख़ुश’फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
          ये आख़िरी शम्में भी बुझाने के लिए आ ।
          
           एक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम
          ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ ।
          
          कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मुहब्बत का भरम रख
          तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ ।

         
          माना की महोब्बत को छुपाना है महोब्बत
          चुपकेसे किसी रोज जताने के लिए आ ।

जैसे तुम्हे आते हैं न आने के बहाने
वैसे ही किसी रोज ना जाने के लिये आ ।
          
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ ।
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ ।

          २९ डिसेंबर २०१२
          रात्री ८.४५

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